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गुरुवार, 4 जनवरी 2018

इतिहास, समाज और राजनीति के आईने से कश्मीर की पड़ताल करती पुस्तक- 'कश्मीरनामा'


[लगभग पौने पाँच सौ पेज़ की यह किताब प्रकाशक राजपाल एंड संस के स्टाल पर पुस्तक मेले मे उपलब्ध रहेगी। जो मित्र मेले नहीं आ पा रहे वे अमेजोन से ले पाएंगे। किताब अभी वहाँ उपलब्ध नहीं है लेकिन लिस्ट हो गई है, विश लिस्ट मे डाल लें ताकि आते ही सूचना मिले। घर बैठे पाने के लिए sales@rajpalpublishing.com पर अपना पता मेल कर दें कश्मीरनामा का ज़िक्र करते हुए। किताब वीपी से पहुंचेगी। मेले के बाद किताब देश भर के स्टाल्स पर भी उपलब्ध होगी]

हिंदी में कश्मीर समस्या पर पहली मुक्कमल किताब- डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल

#कश्मीरनामा ...... (इतिहास और समकाल) 
पिछले दो-तीन दशकों से कश्मीर एक ज्वलंत मुद्दे के रूप में राष्ट्रीय पटल पर छाया हुआ है | इस प्रदेश को लेकर शेष भारत में जितनी संवेदनशीलता पायी जाती है, किसी अन्य राज्य को लेकर नहीं | और यह संवेदनशीलता अनायास नहीं है | वहां आरम्भ हुए पृथकतावादी आन्दोलन ने आम भारतीयों के मन में कई तरह की शंकाएं और कई तरह के सवालों को जन्म दिया है | हालाकि भारत में कश्मीर ही अकेला राज्य नहीं है, जहाँ पर पृथकतावादी आन्दोलन चल रहा है | या जहाँ के पृथकतावादी आन्दोलन में आतंक और हिंसा का बोलबाला है | पूर्वोत्तर में भी ऐसे पृथकतावादी आन्दोलन चले हैं या चल रहे हैं, जिन्होंने आतंक और हिंसा को अपना हथियार बनाया है |
लेकिन पूर्वोत्तर के पृथकतावादी आन्दोलनों को लेकर भारत में न तो उतनी चिंता पायी जाती है और न ही उतनी संवेदनशीलता | उनमें और कश्मीर में कुछ बुनियादी अंतर है | एक तो जम्मू और कश्मीर बड़ा राज्य है | दूसरे यहाँ के मसले में हमारा पडोसी देश पाकिस्तान सीधे-सीधे शरीक है | यानि कि यह समस्या बाह्य आरोपित भी है | तीसरे उसमें आजादी के समय से चले आ रहे विवाद की भी भूमिका है | चौथे उसमें हिन्दू और मुस्लिम वाला एंगल भी जुड़ा हुआ है | और फिर भारत में कश्मीर को अपने माथे के रूप में देखे जाने की ख्वाहिश भी पाई जाती है, सो वह अलग से महत्व पा जाता है | पूर्वोत्तर के पृथकतावादी आन्दोलनों में इतने सारे स्टेक नहीं पाए जाते, इसलिए अलगाव और हिंसा के बावजूद भी शेष भारत में उनको लेकर एक निश्चिन्तता पाई पायी जाती है कि हम उन्हें किसी न किसी तरह से हल कर ही लेंगे |
लेकिन दुर्भाग्य यह कि जिस कश्मीर को लेकर शेष भारत में इतनी संवेदनशीलता पायी जाती है, उसी कश्मीर के बारे में समाज में भयानक अज्ञानता भी देखने को मिलती है | इसको बढ़ाने में वैसे तो सबसे बड़ा योगदान मुख्यधारा की मीडिया का ही है, लेकिन हिंदी पट्टी के विचारकों की बेरुखी भी कम कारक नहीं है | परिणामस्वरूप शेष भारत में कश्मीर के प्रति और कश्मीर में शेष भारत के प्रति अविश्वास और गलतफहमी की भारी खाई बनती गयी है | मसलन शेष भारत के लोग कश्मीर को तो अपना अभिन्न अंग मानते हैं और उसके लिए किसी भी कुर्बानी के लिए तैयार रहने की बात करते हैं, लेकिन बात जब कश्मीरियों की आती है तो वे उनके प्रति उतनी अभिन्नता नहीं दिखाते |
और फिर राजनैतिक नेतृत्व की भूमिका को भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता, जिसके समय-समय पर लिए गए गलत फैसलों ने भी इस समस्या को नासूर बना दिया है | पडोसी देश पाकिस्तान की नकारात्मक भूमिका को भी हम नहीं भूल सकते हैं, जिसने आतंकी मदद के जरिये धरती के इस स्वर्ग को तबाह करने की हर चंद कोशिश की है | कश्मीरी नेतृत्व की कमजोरी और कट्टरपंथी तत्वों की मजबूती ने इस समस्या को और अधिक गहरा बनाया है | और इन सबके साथ हमारी अज्ञानता के दुर्योग ने आग में घी डालने का काम किया है |
मसलन हम न तो व्यवस्थित रूप से कश्मीर का इतिहास जानते हैं और न ही वहां की संस्कृति से भली-भांति परिचित हैं | आजादी के समय उसके भारत में विलय को लेकर भी हमारे पास कोई बहुत व्यवस्थित जानकारी नहीं है | धारा 370 के प्रावधानों और कश्मीर को दिए गये विशेष दर्जे को लेकर भी हमारे मन में बहुत सारी भ्रांतियां हैं | आजादी के बाद दिल्ली और कश्मीर के मध्य विकसित हुए संबंधों से भी हम लगभग अनजान ही हैं | और फिर हमारे पास नब्बे के दशक में शुरू हुए पृथकतावादी हिंसात्मक आन्दोलन के बारे में भी बहुत मुकम्मल जानकारी नहीं है | हम कश्मीरी पंडितों के पलायन की परिस्थितियों और कारणों से भी ठीक से परिचित नहीं हैं | हम नहीं जानते कि वहां का पृथकतावादी आन्दोलन कैसे हिंसात्मक रूप अख्तियार कर लेता है और कैसे अपनी नकारात्मक भूमिका के जरिये पाकिस्तान उसे इस्तेमाल करता है | इस अलगाववादी और आतंकवादी आन्दोलन ने किस तरह से कश्मीरी समाज के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न किया है, हमें इसकी भी कोई मुकम्मल जानकारी नहीं हैं |
ऐसी अनेकानेक अज्ञानताओं के कारण न तो हम कश्मीर को ठीक से समझ पाते हैं और न ही उसके बारे कोई व्यवस्थित राय बना पाते हैं | इन विषयों में अधिकतर पर हमारी राय सुनी-सुनाई अफवाही बातों से ही बनती है | हम उसी अफवाही मीडिया और विभाजनकारी बातों के घेरे में पिसे जाने को अभिशप्त हैं, जिनसे न तो कश्मीर के लोगों का भला हो रहा है और न ही शेष भारत का |
तो ऐसे में Rajpal & Sons प्रकाशन की यह सूचना हम पाठकों के लिए किसी तोहफे से कम नहीं है कि इस पुस्तक मेले में वे कश्मीर पर लिखी हुई Ashok Kumar Pandey की शोधात्मक किताब प्रकाशित करने जा रहे हैं, जिसका शीर्षक है “कश्मीरनामा – इतिहास और समकाल” | यानि कि गत एक वर्ष से हम पाठकों को जिस किताब का इन्तजार था, वह अब पूरा होने जा रहा है |
इस किताब के बारे समय-समय पर मिलने वाली जानकारियों के आधार पर कह सकता हूँ कि यह कश्मीर के बारे में उठने वाले तमाम सवालों से टकराती है और उनका वस्तुपरक और तर्कसंगत जबाब देने का प्रयास करती है | इसे पढ़ते हुए हम कश्मीर समस्या की जड़ों तक भी पहुँच सकेंगे और उसके तमाम पहलूओं के बारे में एक सुव्यस्थित राय भी विकसित कर पाएंगे | बेशक कि कश्मीर के विभिन्न पहलूओं को लेकर अन्य कई भाषाओँ, खासकर अंग्रेजी में, कई पुस्तकें पहले से मौजूद रही हैं लेकिन इस विषय पर हिंदी में आने वाली यह पहली मुकम्मल किताब है | इस नाते भी इस किताब का गर्मजोशी से स्वागत किया जाना चाहिए |
एक जरुरी समय में एक जरुरी किताब के लिए लेखक और प्रकाशक को हमारी बधाई पहुंचे | उम्मीद है कि इस पुस्तक मेले में यह किताब जरुर हमारे हाथ में होगी |
Ramji Tiwari जी की वॉल से साभार


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