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शनिवार, 25 फ़रवरी 2017

उदय प्रकाश की कथा सृष्टि का स्त्री पक्ष: -विनय कुमार मिश्र

उदय प्रकाश की कथा सृष्टि का स्त्री पक्ष

-विनय कुमार मिश्र 

सभ्यता के विकास के साथ स्त्रियाँ शिक्षा में आगे बढ़ रहीं हैं. छोटी से बड़ी नौकरियों में, व्यवसाय में तथा जीवन के विविध क्षेत्रों में इनकी मौजूदगी दिख रहीं है. बावजूद इसके पुरुष प्रभुत्ववादी समाज में स्त्रियों को समानता का हक ,पक्ष और सम्मान नहीं मिला हैं. स्त्रियों का जीवन निरंतर जटिल चक्रव्यूह में उलझता दिख रहा है. 73वें-74वें संविधान संशोधन के तहत पंचायत तथा नगर निकायों के चुनाव में स्त्रियों के लिए एक तिहाई आरक्षण का प्रावधान किया गया है, लेकिन सबसे बड़ी विडम्बना कि स्त्रियों के लिए एक तिहाई आरक्षण का विधेयक भारतीय संसद में अभी तक लटका है. तथाकथित आधुनिक और उत्तर आधुनिक दौर में, सदियों से शोषित स्त्रियों के शोषण के तौर तरीकों में काफी बदलाव देखा जा सकता है. स्त्रियों के शरीर एवं मन तथा श्रम एवं सौंदर्य का शोषण अनेक स्तरों पर अनेक रूपों मे दिख रहा है. उदय प्रकाश की रचनात्मकता का एक महत्वपूर्ण पक्ष स्त्रियाँ और उनका जीवन है. इस जीवन की बहुविध छबियां उदय प्रकाश के रचना जगत में पूरी संवेदनीयता से व्यक्त हुई हैं.

समसामयिक दौर में पूंजी और बाज़ार सब कुछ हो गया है.बाज़ार स्त्री को सुन्दर और विशिष्ट स्त्री का प्रलोभन देता है. यही प्रलोभन स्त्री को बाज़ार के शिकंजे में फंसा देता है. ‘औरत बिकाऊ और मर्द कमाऊ के महान चकाचक युग’ में विज्ञापन से सनसनी पैदा करने वाली ‘सुनीला’ और ‘आशा’ जैसी मॉडल उदय प्रकाश की कहानी ‘पॉल गोमरा का स्कूटर’ में हैं. “ब्लेड के विज्ञापन से सनसनी पैदा कर देने वाली सर गंगाराम हॉस्पिटल की सफाई कर्मचारी राम औतार आर्य की सत्रह साल की बेटी सुनीला ......... को पिछले आठ महीने में तीन बार टर्मिनेशन कराना पड़ा था और दो हफ्ते पहले एक खबर के मुताबिक उसे एचआइवी पॉजिटिव पाया गाया था. ....... घोड़े की पीठ पर पिघलकर बियर का फेन बन जाने वाली आशा मिश्रा को .... पिछले दिनों राजधानी के पर्यटन विभाग के एक बारबेक्यू में काट–काट कर तन्दूर में भून डाला गया था.”1 बाज़ारवाद के दौर में विज्ञापन की दुनिया का यह कटु यथार्थ है. इसी प्रकार ‘मैन्गोसिल’ कहानी में “दीप्ति और शालिनी ‘सी’ ग्रेड मॉडल और सस्ते साबुन,हेयर रिमूवर, अंडरगारमेंट्स के सस्ते विज्ञापनों के अलावा वे रात में होटलों या प्राइवेट पार्टियों में चलती हैं.”2 इस दौर में लड़कियों की एक बड़ी तादाद देह-प्रदर्शन,नाइट-पार्टी ,विज्ञापन के ग्लैमर में गुम होने के लिए अभिशप्त हैं. यह उत्तर आधुनिक समय है,जहाँ स्त्री का शरीर एक ‘पण्य’ के रूप में बदला जा चुका है. इस सन्दर्भ में सुधीश पचौरी का मानना हैं कि “स्त्री-विमर्श के जागरण के पीछे दो उत्त्तर आधुनिक परिदृश्य सक्रिय हैं. एक स्त्री का दृश्य में अधिक होना. और दृश्य में उसकी देह का होना. ये दोनों परिदृश्य उच्च या अति पूंजीवाद के परिणाम ही हैं, जिन्हें हम उपभोक्ता संस्कृति के उपादानों के रूप में,माध्यमों मे,विज्ञापनों में पाते हैं.”3 

कई बार साधारण ग़रीब स्त्रियों के साथ पूंजी,सत्ता और प्रशासन के लोग दर्दनाक दरिन्दगी का खेल खेलते हैं. ‘मैन्गोसिल’ कहानी की शोभा सारणी में रोज़ सामूहिक बलात्कार और शारीरिक हिंसा का शिकार होती थी- दारोगा, बिल्डर और ब्याहता पति रमाकान्त द्वारा. बिल्डर और दरोगा भ्रष्ट सत्ता के लोग हैं. रमाकांत वह निम्नवर्गीय चरित्र है जो किंचित व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए भ्रष्ट सत्ता का नौकर दलाल और चापलूस बन गया है इस सामजिक अमानवीयता और अनैतिकता के प्रति लोगों में सामूहिक विरोध या प्रतिरोध की उत्प्रेरणा नहीं है. सारणी में रमाकांत के घर के आसपास के लोग उसके घर में चलने वाली वीभत्स खूनी और वहसी हिंसा को देखने के लिए रात भर जागते हैं. असहनीय दर्द के बीच बेहोसी टूटने पर “शोभा जब कराहती हुई अपनी देह से अपना खून और दारोगा,बिल्डर और अपने पति रमाकांत का थूक,लार और वीर्य धो रही थी ,तब उसे अहसास हुआ कि चार बजे के उस धुंधलके में,गली के उस पार से कई मर्द आँखें उसे घूर रही हैं.”4 ख्याल रहे ये आँखें पुरुषों की हैं, स्त्रियों की नहीं. स्त्री का शोषण कई स्तरों होता है ,जिसका केंद्र अक्सर उसकी देह होती है मार-पीट, भ्रूण-हत्या, दहेज़-दहन,यौन-दोहन, पोर्नोग्राफी, वेश्यावृत्ति, बलात्कार जैसे मामलों में. हिंसा,बर्बरता और क्रूरता की शिकार ईमानदार-श्रमशील स्त्रियों उदय प्रकाश की रचनाओं में प्रमुखता से उपस्थित हैं.

नए साभ्यतिक दौर में अधिकतर पुरुष प्रभुत्व और प्रताड़ना के भाव से भरे हैं. ‘पीली छतरी वाली लड़की’ में राहुल के अनुसार “लड़कियाँ दरअसल चोट,पीड़ा-हिंसा और ताकत को प्यार करती हैं.वे मूर्ख बनाया जाना ,उत्पीडित होना और निर्ममता से भोग लिए जाने को ज्यादा पसंद करती हैं.”5 कथाकार की राहुल के प्रति पूरी सहानुभूति और संवेदना के बावजूद उपरोक्त विचार पुंसवादी हैं. स्त्रियों के साथ सत्ता, प्रशासन के लोग और पूंजीपति अक्सर दर्दनाक दरिन्दगी भरा खेल खेलते हैं. 

यह देखा जाता है कि बलात्कार की शिकार स्त्री परिवार में,समाजमें, यहाँ तक कि थाने में, अदालत में,और मीडिया में भी कई बार निरुपाय,असहाय और अकेली पड़ जाती है. स्त्री पर हुई इस बर्बरता का विश्लेषण कई बार इस तरह होने लगता है कि मानो अपने बलात्कार या यौन की शोषण के लिए वह स्वयं ही जिम्मेदार है. स्त्री पर बर्बरता और हिंस्रता का यह विस्तार दफ्तरों ,विविध संस्थानों शैक्षणिक संस्थानों और परिवार तक ही नहीं फैला है, बल्कि बदलते दौर की अद्यतन तकनीक स्त्री का पता गर्भ में भी ढूंढ लेती है. उदय प्रकाश की कविता ‘औरतें, की पंक्तियाँ हैं-

“एक पोंचा लगा रही है 

एक बर्तन मांज रही है

एक कपडे पछीट रही है 

एक बच्चे को बोरे पर सुला कर रोड़े बिछा रही है 

एक फर्श धो रही है और देख रही है राष्ट्रीय चैनल पर फैशन परेड 

एक पढ़ रही है न्यूज़ की संसद में बढ़ायी जाएगी उनकी तादाद 

* * * 

हजारों लाखों छुपती हैं गर्भ के अँधेरे में 

इस दुनिया में जन्म लेने से इनकार करती हुई 

वहां भी खोज लेती हैं उन्हें भेदिया ध्वनि तरंगें

वहां भी भ्रूण में उतरती है हत्यारी कटार.” .6 

यह स्त्री जीवन का सच है. उसे अक्सर जीवन के हर मोड़ और प्रत्येक कोण पर शोषित होने के लिए विवश होना पड़ता है. दास प्रथा के दौर में स्त्रियों के साथ पुरुष भी बिकते थे. आज के समय में स्त्री को नाचने-गाने,मनोरंजन और विज्ञापन में उत्पाद से अधिक कुछ नहीं माना जाता है. अभय कुमार दुबे ने ठीक ही कहा है की इस दौर में “औरतों को अतीत की किसी भी कालावधि के मुकाबले एक बिकाऊ जिंस में बदल दिया गया है”7 स्त्री-आजादी और उन्मुक्तता एक छलावा मात्र है .स्त्रियों पर अत्याचार की मात्रा बढ़ी है. ‘पीली छतरी वाली लड़की’ में उदय प्रकाश कहते हैं –“ जिस अनुपात में ब्यूटी –कांटेस्ट और फैशन परेड बढ़ रहे थे ,उसी अनुपात में औरतों की खरीद फरोख्त और उन पर जुल्म भी बढ़ रहे थे.”8 स्त्री-देह का स्वछन्द प्रदर्शन स्त्रियों की शारीरिक-मानसिक और सामाजिक जकडबंदी को और मज़बूत करता प्रतीत हो रहा है.

समसामयिक दौर में कुछ स्त्रियाँ अपने शरीर का उपयोग ,निहित तुच्छ स्वार्थों के लिए व्यवसाय में करती हैं. तथाकथित ‘बोल्ड स्त्रियों’ के नारीवादी विमर्श का उद्देश्य दमित – पीड़ित स्त्री जाति को एक सकारात्मक दिशा प्रदान करना नहीं ,अपितु अपनी व्यक्तिगत हैसियत ,रुतबा कायम करना है. उदय प्रकाश लिखते हैं – “एक ऐसा फेमिनिज्म या नारीवाद आया था, जिसमे जो औरत मेहनत करती थी,वह जिंदगी भर नर्स,टीचर,स्टेनो,टाइपिस्ट या घरेलू कामकाज करने वाली ‘बाई’बनी रह जाती थी. या फिर ‘गीता पढ़कर सीता’ बनने वाली थकी- पिटी ,मैली-कुचैली पत्नी. लेकिन अगर वह देह का धंधा करने लगती थी ,तो देखते ही देखते उसकी कोठी खड़ी हो जाती थी. वह कार में चलने लगती थी.”9 

यह भी देखा जाता है कि सिर्फ मज़ा ,सुख ,और दौलत चाहने वाले तथाकथित अभिजन चापलूस, व्यापारी, और सत्ताकामी माता-पिता अपनी बेटियों और परिवार की स्त्रियों का इस्तेमाल भी करते हैं. ‘वारेन हेस्टिंग्स का साड़’ कहानी में मोहिनी ठाकुर ऐसे ही परिवार की एक लड़की थी. “शेक्सपियर के कुछ नाटकों के अंश उसने कंठस्थ कर रखे थे. पियानो बजाना उसने सीखा था. बिल्कुल ब्रिटिश उच्चारण के साथ अंग्रेजी बोलती थी. उसके पिता को तम्बाकू और मछली के व्यापर का मिदनापुर,कलकत्ता और मालदा का कॉन्ट्रैक्ट ईस्ट इंडिया कंपनी से प्राप्त करना था. मोहिनी ठाकुर को अपने परिवार की समृद्धि के लिए यह कम ‘होशियारी’ से करना था .........वह बहुत होशियार थी. रात में डाउनटन ने बिस्तर पर उसे जाना कि वह अद्भुत थी.”10 बार-बार कंपनी के अफसरों की सेवा में प्रस्तुत होने से इंकार करने पर उसकी माँ नंदिनी ठाकुर उसे समझाती है कि –“मोना दुनिया तेज़ी से बदल रही है.यूरोप में औद्योगिक क्रांति हो गयी है. ईस्ट इंडिया कंपनी सारी इंडिया को अपने कब्जे में करेगी. तुम जरा सा प्रैक्टिकल हो जाओ तो हम ऐश करेंगे.”11 यह अनैतिकता और निर्लज्जता की पराकाष्ठा है,यहाँ दौलत सर्वोपरि है. मान सम्मान सबकी कीमत पर.

हनी ट्रैप(honey trap) के लिए स्त्रियों का प्रयोग एक प्रचलित नुस्खा बनता जा रहा है. ‘मोहनदास’ कहानी में मोहनदास की अस्मिता और अस्तित्व को हड़प कर नौकरी करने वाला बिसनाथ अपनी पत्नी का प्रयोग करता है. बिसनाथ अपने कारनामे की इंक्वायरी करने वाले वेलफेयर आफिसर ए.के. श्रीवास्तव के लिए अपने फ्लैट पर गज़ब की व्यवस्था करता है –

“अपने फ्लैट में उसने श्रीवास्तवजी का सत्कार किया. अपनी पत्नी अमिता को उसने लो कट ब्लाउज और नीची साड़ी में शरबत का ट्रे लेकर ड्राइंग रूम में आने का निर्देश दे रखा था . ..... इंक्वायरी अफसर की नज़र बार-बार अमिता की खुली नाभी पर अटक जाती थी. टी. वी. पर इन दिनों दिल्ली-मुंबई में चलने वाले फैशन शो के कार्यक्रम समाचार चैनलों पर खूब दिखाए जाते थे. लेकिन यहाँ तो बिलकुल जिंदा मॉडल जैसी औरत सामने खडी थी.”12 स्त्रियों के ऐन्द्रिक और लुभावने रूप का अक्सर सफल इस्तेमाल होता है. सत्ताकामी लोग स्त्रियों के मादक रूप और उत्तेजक भंगिमाओं के जरिये अपने मकसद में कामयाब होते हैं . 

स्त्री जीवन के विविध रूपों में मातृत्व रूप सर्वोपरि है,जिसका विमुग्ध वर्णन उदय प्रकाश के कथाख्यानों में मौजूद है. ‘मैन्गोसिल’ कहानी में “शोभा को लग रहा था जैसे उसकी देह की, अनगिनत शिराएँ उसके फूले हुए दोनों स्तनों की ओर बहने वाली असंख्य अदृश्य नदियों में बदल गयी हैं.उसकी देह एक धीमी सनसनाहट में काँप रहीं थीं. उसके शरीर की करोड़ों कोशिकाओं और नदियों में कोई एक ऐसा रहस्यपूर्ण संगीत बज रहा था, जो रक्त के दूध में बदलने का अलौकिक आदिम संगीत होता है. .......और जिसे इस पृथ्वी पर कोई और नहीं, सिर्फ स्त्री ही सुनती और जानती है.”13 उदय प्रकाश के ‘मूंगा धागा और आम का बौर’; ‘नेलकटर’;‘अरेबा परेबा’ जैसे कथाख्यानों में मातृत्व की गरिमामयी,आत्मीय और संरक्षणीय उपस्थिति स्वतः-स्फूर्त संवेदनीयता के साथ अभिव्यक्त हुई है. 

दाम्पत्य जीवन में भी स्त्रियों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है. मोहनदास की कस्तूरी “सुबह से लेकर रात तक,हर रोज़ बिना नागा ,हर सुख-दुःख, हारी-बीमारी में वह (कस्तूरी उसके(मोहनदास) साथ खड़ी रही.”14 विपत्तियों और हताशा-निराश के बीच वह मोहनदास का ढाढ़स भी बढाती है. ‘मैन्गोसिल’ में चन्द्रकान्त की शोभा दिन-रात परिश्रम करती है. सुबह मुंह अँधेरे से देर रात तक किया जाने वाला श्रम-गृहकर्म भारतीय स्त्री के जीवन का सच है. यही नहीं,घर चलाने के लिए “शोभा आसपास के घरों में बड़ियाँ ,आचार ,मुरब्बा और खाने बनाने का काम करने लगी.”15 

उदय प्रकाश के कथख्यानों में श्रमशील स्त्रियों की भूमिका जीवन-संसार में अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रभावी है. ‘वारेन हेस्टिंग्स का साड़’ कहानी में वारेन हेस्टिंग्स ‘सधी कलाकार’,‘मेहनती’, ‘फूलों की गमक बिखेरने वाली’,’हद दरजे की जिमनास्ट’, जैसी श्रमशील स्त्रियों से बेहद आकर्षित और प्रभावित होता है. उसने यहाँ रहते हुए पाया था कि “यहाँ औरतें भी ऐसी ही थीं. वे लकड़ियाँ काटती, भारी बोझ सर पर उठातीं, नदियों से मछलियाँ पकड़ लातीं और अनाज के बदले उन्हें बाज़ार में बेचतीं .वे गन्दी थीं .उनके बच्चे उनकी कमर या पीठ पर बन्दर के बच्चों की तरह चिपके होते थे.”16 ये स्त्रियाँ दलित हैं. श्रमशीलता दलित स्त्रियों की बुनियादी पहचान है. 

उदय प्रकाश की रचनात्मक और वैचारिक प्रतिबद्धता स्त्रियों के साथ गहरे अपनापे के साथ जुड़ी है. ये स्त्रियों की जीवन दायिनी शक्ति से गहरे अभिभूत है. ये कहते हैं कि “सिर्फ स्त्रियाँ जानतीं हैं कि किसी जीवन को जन्म या पुनर्जन्म कैसे दिया जाता है.”17 इन्होने अपनी रचनाओं में स्त्री-जीवन के विविध पहलुओं को इस संश्लिष्टता के साथ गूंथ दिया है कि ये प्रसंग जीवन के, सहज स्वाभाविक अंग लगते हैं, ऊपर से आरोपित नहीं. इनकी कथा सृष्टि में स्त्री जीवन का सच पूरी प्रमाणिकता के साथ अभिव्यक्त हुआ है. 



--विनय कुमार मिश्र 
6/1 क्षेत्र चटर्जी लेन 
बांधाघाट –सालकिया 
हावड़ा -711106 
मो. 9748085097 
सन्दर्भ सूची



1. उदय प्रकाश,पॉल गोमरा का स्कूटर ,वाणी प्रकाशन ,नई दिल्ली ,संस्करण 2006 पृष्ठ-44 

2. उदय प्रकाश,मैन्गोसिल ,पेंगुइन बुक्स ,नई दिल्ली संस्करण 2006 पृष्ठ-87 

3 पचौरी सुधीश, ऐसा जो मर्द नहीं लिखते (लेख),औरत उत्तरकथा –सं.-राजेन्द्र यादव,अर्चना वर्मा,राजकमल प्रकाशन ,नई दिल्ली संस्करण-2013,पृष्ठ -122 

4. उदय प्रकाश ,मैन्गोसिल ,पेंगुइन बुक्स ,नई दिल्ली संस्करण 2006 पृष्ठ-92 

5. उदय प्रकाश, पीली छतरी वाली लड़की ,वाणी प्रकाशन ,नई दिल्ली ,संस्करण 2009 पृष्ठ-9 

6. उदय प्रकाश,रात में हारमोनियम ,वाणी प्रकाशन ,नई दिल्ली ,संस्करण -2009,पृष्ठ-33 

7. दुबे अभयकुमार, पितृसत्ता के नए रूप (लेख),भारत का भूमंडलीकरण –सं –अभय कुमार दुबे, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली,संस्करण 2007 ,पृष्ठ -33 

8. उदय प्रकाश ,पीली छतरी वाली लड़की ,वाणी प्रकाशन ,नई दिल्ली ,संस्करण 2009 पृष्ठ-132 

9. उदय प्रकाश ,पीली छतरी वाली लड़की ,वाणी प्रकाशन ,नई दिल्ली ,संस्करण 2009 पृष्ठ-133 

10.उदय प्रकाश .पॉल गोमरा का स्कूटर ,वाणी प्रकाशन ,नई दिल्ली ,संस्करण 2006 पृष्ठ122-123 

11.उदय प्रकाश .पॉल गोमरा का स्कूटर ,वाणी प्रकाशन ,नई दिल्ली ,संस्करण 2006 पृष्ठ125 

12 उदय प्रकाश ,मोहन दास ,वाणी प्रकाशन ,नई दिल्ली संस्करण 2009 पृष्ठ.49 

13.उदय प्रकाश ,मैन्गोसिल ,पेंगुइन बुक्स ,नई दिल्ली संस्करण 2006 पृष्ठ-121 

14.उदय प्रकाश ,मोहन दास ,वाणी प्रकाशन ,नई दिल्ली संस्करण 2009 पृष्ठ-24 

15.उदय प्रकाश ,मैन्गोसिल ,पेंगुइन बुक्स ,नई दिल्ली संस्करण 2006 पृष्ठ126 

16.उदय प्रकाश .पॉल गोमरा का स्कूटर ,वाणी प्रकाशन ,नई दिल्ली ,संस्करण 2006 पृष्ठ106 

17.उदय प्रकाश,और अंत में प्रार्थना ,वाणी प्रकाशन,नई दिल्ली संस्करण -2006 पृष्ठ-11 

















                       

          
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