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समीक्षा की दहलीज पर उपेक्षित रचनाएं: कौशलेंद्र प्रपन्न


समीक्षा की दहलीज पर उपेक्षित रचनाएं


कौशलेंद्र प्रपन्न
शिक्षा एवं भाषा विशेषज्ञ
टेक महिन्द्रा फाउंडेशन
दिल्ली


आज साहित्य की विभिन्न विधाओं में हजारों की तदाद में रचनाएं हो रही हैं। यदि साहित्यिक वैश्विक पटल पर देखें तो रोजदिन साहित्य की रचना विभिन्न माध्यमों में हो रही हैं। वह माध्यम चाहे मुद्रित हो व गैर पारंपरिक हर माध्यम में रचनाएं की जा रही हैं। तकनीक के विकास के साथ ही लेखन की चैहद्दी टूट गई है। अब सोशल मीडिया में भी साहित्यिक रचनाएं लगातार हो रही हैं। लेखक अब किसी भी संपादक, पत्र-पत्रिका आदि का मुंहताज नहीं रहा। जो लिखता है वो प्रकाशित व वेबकास्ट करता है। वेबकाटिंग और अभिव्यक्त करने में आज कई सारी बाधाएं खत्म हो चुकी हैं। जो लिखेगा वो छपेगा। जो छपेगा वेा लिखेगा। इस सिद्धांत पर लोग लिख और छप रहे हैं। वह छपना चाहे आपके फेसबुक पेज हो, ब्लॉग पर हो या फिर लिंगडेन आदि वेब पन्नों पर हो, कुल मिलाकर लोग लिख रहे हैं। धड़ाधड़ लिखना और बाजार में फेंकना जारी है। यह अलग विमर्श का मुद्दा है कि जो चीजें लिखी जा रही हैं क्या उन्हें हम साहित्य मानें यानी त्वरित टिप्पणियों की श्रेणी में रखें। सवाल यह भी उठता है कि वर्तमान समय में लिखी जा रही कविताएं, कहानियां, व्यंग्य, टिप्पणियां क्या साहित्य में गिनें या महज गद्य की विधाओं की रचनाओं के खांचे में डालें। अब एक अहम सवाल यह भी उठता है कि जो लिखा जा रहा है क्या उसका मूल्यांकन,समीक्षाएं,जांच पड़ताल जैसी कोई चीज हो भी रही है या नहीं। क्योंकि जो कुछ भी लिखा जा रहा है उसकी महत्ता और औचित्य का निरीक्षण करना भी आवश्यक है। दूसरे शब्दों में उपरोक्त माध्यमों में लिखी जा रही रचनाओं का समुचित मूल्यांकन और समीक्षा होना जरूरी है। 

एक ओर पारंपरिक प्रकाशन घराने हैं जहां किताबों को प्रकाशित करने से पूर्व संपादक मंडल यदि है तो, में रखा जाता है। जब संपादक मंडल किसी भी पांडुलिपि को छपने योग्य समझती है तब वह अनुमोदन देती है। लेकिन आज जिस तेजी से प्रकाशन घरानों में इजाफा हुआ है उसी रफ्तार से संपादक मंडल सिमटते गए हैं। अब वहां संपादक नाम का जीव अव्वल तो रहा नहीं और यदि है भी तो उसकी हैसियत दंत विहीन कर दी गई है। ऐसे में किताबें छापना एक अन्य व्यवसाय की भांति ही उत्पाद वस्तु में तब्दील हो चुकी है। जहां कंटेंट से ज्यादा मुद्रा अहम हो चुका है। यह किसी से भी दबा छुपा तथ्य नहीं रहा है कि ले देकर किताबें छापी जा रही हैं। ऐसे में क्या लिख गया है, कैसे लिखा गया है, आदि की जांच करने वाला कोई नहीं हैं। तुर्रा यह कि लेक्चरर व्यवसाय में किताबें छपीं हों जिसपर प्वांइंट मिला करती हैं इस नियम के बाद जहां कहीं से भी जैसे भी हो कुछ भी छपा लो साथ ही पीएचडी थिसिस भी छपा कर अंक लेने में लगे हैं। 

आज लेखक बिना इंतजार किए तुरत फुरत में छप जाना चाहता है। जिस आनन-फानन में छपता है उसी जल्दबाजी में पुस्तक लोकार्पण कराना भी उसकी सूची में शामिल होता है। दस बीस कॉपी लेकर अपने स्वजन परिजनों में बांट कर शांत हो जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में एक अहम बिंदु कहीं पीछे छूट जाती है किताब व रचना का मूल्यांकन। यहां भी बड़ा झोल है। अपने परिचितों से समीक्षा करा कर किसी पत्रिका में भेज देना भी खासा आम परिघटना है। यदि समीक्षा नहीं छपी तो रात की नींद खराब हो जाती है। इसलिए अपनों से आग्रह कर समीक्षाएं भी लिखा ली जाती हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि किताब की समीक्षा की जा रही है या पुस्तक परिचय लिखा जा रहा है क्योंकि अमूमन समाचार पत्रों में छपने वाली समीक्षाएं दरअसल पुस्तक परिचय हुआ करती हैं। क्या समीक्षा छह सौ से हजार शब्दों में संभव है? इस हकीकत से भी हम नहीं बच सकते कि विभिन्न पत्रों में छपने वाली पुस्तक समीक्षाएं आज सिर्फ परिचयात्मक लेख में परिवर्तित हो चुकी हैं। उसमें समीक्षा के छौंक लगा कर बेचे जा रहे हैं। 

यह एक चिंता का विषय है कि समाचार पत्रों में बहुत तेजी से साहित्यिक पन्ने सिमटते चले गए। उसमें भी भाषायी समाचार पत्रों में अंग्रेजी के एक दो अखबारों में साहित्य के लिए पर्याप्त जगह दी जाती है। उसमें भी साक्षात्कार, समीक्षाएं, आलेख आदि मिल जाती है। इस दृष्टि से हिन्दी के समाचार पत्रों में सूखा नजर आता है। एक पन्ने पर समीक्षा, किताब परिचय, लेख सबका एक आस्वाद परोस दिया जाता है। यूं तो एक ही पन्ने पर साहित्य की विविध छटाओं का आस्वाद मिल जाता है लेकिन समस्या यह है कि किसी एक विधा का पूरा विस्तार नहीं हो पाता। ऐसे में जरूरी है कि हमें साहित्य के लिए समाचार पत्रों,पत्रिकों में समुचित स्थान मुहैया कराया जाए ताकि खुल कर समीक्षा किया जा सके। 

कहानी,कविता, व्यंग्य एवं उपन्यास विधा में प्रचूर मात्रा में लिखी जा रही हैं। हर साल कम से कम हिन्दी में हजारों पुस्तकें इन विधाओं में छपती हैं। लेकिन जब हम समीक्षा, आलोचना, निबंध की बारी आती है तब यह संख्या सौ के अंदर सिमट जाती है। समीक्षा और आलोचना विधा में न तो पर्याप्त प्रमाणिक किताबें हैं और न समीक्षक ही जो पूर्वग्रह रहित समीक्षाकर्म में लगे हैं। यहां इन पंक्तियों का अन्यथा अर्थ न लिया जाए बल्कि यहां सिर्फ यह कहने की कोशिश की जा रही है कि समीक्षा विधा में भी गंभीर काम होना अभी बाकी है। यूं तो साहित्य की तमाम विधाओं श्रमसाध्य कर्म हैं। लेकिन इससे किसे गुरेज होगा कि समीक्षा, मूल्यांकन उससे भी ज्यादा गंभीरता की मांग करता है। पहला शर्त तो यही कि वह साहित्य प्रेमी हो। साहित्य की समझ रखता हो। और उसमें विभिन्न वादों और वैचारिक प्रतिबद्धताओं से विलग होकर रचना को परखने की दृष्टि हो। दूसरा उसके पास समुचित समय हो ताकि पढ़कर समीक्षा लिख पाएं। क्योंकि देखा तो यह भी गया है कि कई बार समयाभाव में महज फ्लैप पढ़कर या दस बीस पन्ने पलट कर समीक्षाएं लिख दी जाती हैं। 

दरअसल समीक्षा व आलोचना की गंभीरता आज छिजती जा रही है। यदि एक नजर लेखकीय सत्ता पर डालें तो वहां केवल और केवल लेखन पर ध्यान दिया जा रहा है। वह रचना कैसी है? किस स्तर की है? उससे कौन सा वर्ग लाभान्वित होने वाला है इसपर भी कोई खास तवज्जो नहीं दिया जाता। पुस्तक लिखने के पीछे व काव्य, कथा सृजन का उद्देश्य क्या है और वह अपने उद्देश्य किस स्तर तक सफल हुआ इसे जांचने परखने वाले बहुत कम हैं। कायदे से इस विधा को और समृद्ध करने के लिए कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। होता तो यह चाहिए कि जिस तरह से तमाम दक्षता विकास के लिए कार्यशालाएं होती हैं। इसी तर्ज पर हमें ऐसी कार्यशालाओं आयोजन समय समय पर करना चाहिए जिसका उद्देश्य प्रतिभागियों में रचना समीक्षा एवं आलोचना के कौशल प्रदान किया जा सके। दूसरे शब्दों में जिस तरह से काव्य पाठ, कथा लेखन कार्यशालाएं होती हैं उसी तरह समीक्षा-आलोचना प्रशिक्षु कार्यशालाओं की योजना बनाई जा सकती है। इसमें न केवल विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग बल्कि अन्य साहित्यिक संस्थाएं भी अपनी कार्ययोजना में इसे स्थान दे सकती हैं। हर वर्ष शोध पत्रों, सेमिनार, बैठकों आदि का आयोजन तो होता ही है कितना अच्छा हो कि इस विषय पर भी गंभीरता से विमर्श किया जाए। हमारे पास साहित्य अकादमी, हिन्दी अकादमी, आईसीसीआर आदि शैक्षिक और अकादमिक संस्थाएं हैं जो चाहे तो इस कार्य को आगे बढ़ा सकते हैं। क्योंकि इन संस्थाओं के मार्फत एक ओर से साहित्य समाज को मजबूती मिलती है वहीं दूसरी ओर साहित्यकारों की नई पौध भी रोशनी में आती हैं। इन संस्थाओं का कार्य सिर्फ साहित्य छापना ही नहीं होना चाहिए बल्कि साहित्य की परंपरा को भी अग्रसारित करने वाले घटकों को सुदृढता प्रदाना करना भी है। 

भारतीय भाषाओं में लिखी जाने वाली रचनाओं को प्रकाशित कर पाठक समाज को सौंपने का काम तो कई सारी संस्थाएं, प्रकाशन संस्थान आदि कर रही हैं। लेकिन रचना समीक्षा-आलोचना की नई पौध तमाम आलोचकीय संसाधनों से लैस हो इसके लिए बहुत कम प्रयास हो रहे हैं। इसका जीता जागता उदाहरण हम छपने वाली विधाओं की किताबों यानी कविता, कहानी, उपन्यास, डायरी, यात्रा वृत्तांत आदि तो बहुतायत मात्रा में मिलेंगी लेकिन उस अनुपात में यदि समीक्षा, आलोचना एवं निबंध आदि विधाओं में किताबों की खासा कमी महसूस होती है। एक ओर हिन्दी और भारतीय भाषाओं में कविता,कहानी आदि विधाओं को ध्यान में रखते हुए तमाम पत्रिकाएं छप रही हैं। कथा, कथादेश, अवां,पाखी, हंस, वागार्थ,तद्भव,पुस्तक वर्ता, समीक्षा, आलोचना, संदर्भ, आधुनिक साहित्य, समकालीन साहित्य, तीसरी दुनिया, भाषा,आजकल,लमही, साहित्य अमृत,समयांतर आदि। जितनी पत्रिकाएं कविता कहानी आदि विधाओं के लिए छप रही हैं उस दृष्टि से देखें तो आलोचना, समीक्षा की पत्रिकाएं बेहद कम हैं। ये तो कुछ वे पत्रिकाएं हैं जो मुद्रित रूप में नियमित छपा करती हैं। वहीं दूसरी ओर इन्हीं के समानांतर सोशल मीडिया के आंगन में झांकें तो पाएंगे कि हजार से भी ज्यादा वेब पत्रिकाओं की भरमार है। हर ई पत्रिका अपने आप को अंतरराष्टीय शोध एवं साहित्य की पत्रिका होने का दावा करती हैं। यदि उन ई पत्रिकाओं के कंटेंट पर नजर डालें तो एक बारगी खुशी तो होती है कि कम से कम लोग लिख पढ़ रहे हैं। कुछ पत्रिकाओं में अच्छी पठनीय सामग्री भी छापी जा रही हैं। वहीं दूसरी ओर कुछ पत्रिकाओं में महज कविताओं,लंबी कहानियों से कागजों के पेट ही भरे जा रहे हैं। 

ई पत्रिकाओं के अलावा कुछ वेब ब्लाॅग भी काफी सक्रिय हैं जहां हमें साहित्य मिल जाया करता है। लेकिन उनके पास आर्थिक मजबूरी ही होगी कि वे मुद्रित रूप में पत्रिका निकाल पाने में सक्षम नहीं हैं। ब्लाॅग, ई पत्रिका, फेसबुक पेज आदि पर रोज दिन कहानियां, कविताएं, व्यंग्य आदि लिखी और वेबकास्ट हो रही हैं। देखना यह है कि जब हिन्दी और साहित्य की करवटों का इतिहास लिखा जाएगा तब क्या इन आभासीय साहित्यों की कहीं कोई चर्चा होगी। क्या इस साहित्य को दस्तावेजित किया जाएगा। सवाल यह भी है कि कविता कहानी,उपन्यास के इस बाढ़ में क्या कोई समीक्षा-आलोचना को भी पार उतारेगा। इस नाव का खेवनहार कौन और कब आएगा?

वर्तमान साहित्यिक परिप्रेक्ष्य में यह देखना भी दिलचस्प होगा कि इन पत्रिकाओं में किस तरह की समीक्षाएं छप व छापी जा रही हैं। इन विषयों पर भी ठहर कर विमर्श करने की आवश्यकता है। किताब की समीक्षा हो न कि महज पुस्तक परिचय छापा जाए। हालांकि पुस्तक परिचय भी गलत नहीं है क्योंकि इस किस्म की पुस्तकीय परिचय कम समय में यह जानने के लिए अच्छा साधन हो सकता है कि फलां किताब किस विषय पर है। लेकिन यदि कोई सम्यक समीक्षा पढ़ना चाहे तो उसके लिए उस तरह के लेख भी प्रकाशित किए जाएं। समीक्षा कैसे की जाए इसकी तालीम यानी कौशल विकास कार्यशालाओं के दौरान नए लेखकों व जिनकी इसमें रूचि है उन्हें इस विधा की बारीक समझ विकसित करने की आवश्यकता है। 

सचपूछा जाए तो किसी भी रचना की समीक्षा, आलोचना या समालोचना करने भी एक कला और कौशल है। इस दक्षता को स्वाध्याय, अध्यवसाय से हासिल किया जा सकता है। लेकिन चुनौती यही है कि आज की तारीख में पढ़ने की आदत लगभग जाती रही। लेखक भी कम ही बचे हैं जो स्वयं के लिखे को छोड़ बहुपठ हों। महज पत्रिकाओं, किताबों को उलट पलट लेना संभव है पढ़ने की श्रेणी में न आए। पढ़ने की उदासीनता के दौर ने केवल लेखक गुजर रहे हैं बल्कि बच्चे और शिक्षक वर्ग भी पढ़ना तकरीबन भूल चुके हैं। सिर्फ वही पढ़ते हैं जिससे परीक्षा पास हो सके। वही पढ़ना जो नितांत जरूरी हो। यह धारणा गहरे पैठती जा रही है। जबकि एक समय था जब लोग स्वांतः सुखाय के लिए पढ़ा करते थे। आनंद प्राप्ति के लिए पढ़ा करते थे। मनोरंजन के लिए पढ़ा करते थे। जब हम इन्हीं बिंदुओं को आज की तारीख में निकष पर कसते हैं तो स्थितियां काफी बदली सी नजर आती हैं। अब लोग मोबाईल में पढ़ते हैं। टेब्लेट्स पर पढ़ते हैं। फेसबुक ट्विटर आदि सोशल साईटों पर लिखा पढ़ते हैं। पढ़ तो यहां भी रहे हैं बस माध्यमों में बदलाव आए हैं। लेकिन अभी भी हमारे समाज में बड़ी संख्या में शिक्षक वर्ग हैं जिन्हें साहित्य न पढ़े हुए एक लंबा वक्त गुजर चुका। जब वे छात्र हुआ करते थे तब उन्होंने निर्मला, गोदान, आधे-अधूरे, गुनाहों के देवता, चीड़ों पर चांदनी आदि साहित्य पढ़े थे। लेकिन वे स्वयं ही बताते हैं कि उस पढ़ने में वो आनंद नहीं था, क्योंकि उस पढ़ने के पीछे परीक्षा पास करने का दबाव था। ऐसे ही कम से कम 2000 शिक्षकों से बातचीत के आधार पर यह कह सकता हूं कि हमारे शिक्षक पढ़ने से दूर हैं। उन्हें पढ़ने का आनंद और पढ़ने में रूचि कैसे पैदा की जाए इस ओर हमें काम करने की आवश्यकता है। 

अंत में रचनाएं हजारों की संख्या में हो रही हैं जिसमें छपने वाले पन्नों और बाइट की संख्या गेगा बाइट और टेरा बाइट में हैं। लाखों और करोड़ों पन्नों में छपने वाले साहित्य को छानने और जांचने के लिए कोई न कोई तो उपकरण हमारे पास होने ही चाहिए। ऐसे में पाठकों के लिए यह जानना कितना मुश्किल हो जाता है कि कविता,कहानी,उपन्यास,आलोचना,निबंध आदि में किस किताब में किस मुद्दे को उठाया गया है। कौन सी किताब किस कंटेंट को विमर्श के घेरे में लेती है आदि। क्या पाठक जो किताब खरीद रहा है वह उसकी जरूरतों को पूरा भी करता है या नहीं? यानी पाठकीय अपेक्षा पर रचना खरी है या नहीं इसके लिए काफी हद तक पाठकों को किताब तो पढ़नी ही पड़ेगी। लेकिन यदि कोई पाठक बिना ज्यादा समय गवाए यदि किसी भी किताब के बारे में जानकारी हासिल करना चाहता है तो उसे समीक्षा व पुस्तकीय परिचय पढ़ कर मिल सकती है। किन्तु अफसोस की बात है कि आज पुस्तकों की गंभीर समीक्षाएं पाठकों को नहीं मिल पा रही हैं। लेखक समुदाय को इस ओर भी ध्यान देने की आवश्यकता है।



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