अभी-अभी
recent
<script>var pfHeaderImgUrl = '';var pfHeaderTagline = '';var pfdisableClickToDel = 0;var pfHideImages = 0;var pfImageDisplayStyle = 'right';var pfDisablePDF = 0;var pfDisableEmail = 0;var pfDisablePrint = 0;var pfCustomCSS = '';var pfBtVersion='1';(function(){var js,pf;pf=document.createElement('script');pf.type='text/javascript';pf.src='//cdn.printfriendly.com/printfriendly.js';document.getElementsByTagName('head')[0].appendChild(pf)})();</script><script type="text/javascript">var pfButtonHTML = '<a href="https://www.printfriendly.com" style="margin-top:0.5em; float:left;display:block; margin-right: 0.5em; color:#6D9F00; text-decoration:none;" class="printfriendly" onclick="window.print(); return false;" title="Printer Friendly and PDF"><img style="border:none;-webkit-box-shadow:none;box-shadow:none;" src="//cdn.printfriendly.com/pf-button-both.gif" alt="Print Friendly and PDF"/></a>'; var pfBloggerJs; pfBloggerJs = document.createElement("script"); pfBloggerJs.type ="text/javascript";pfBloggerJs.src= "//cdn.printfriendly.com/blogger.js"; document.getElementsByTagName("head")[0].appendChild(pfBloggerJs);</script>

'माफ़ करें मुझे किसानों के पक्ष का कोई समकालीन भारतीय साहित्य दिखता नहीं'..: पलाश बिस्वास

by 12:25:00 pm
'माफ़ करें मुझे किसानों के पक्ष का कोई समकालीन भारतीय साहित्य दिखता नहीं'..: पलाश बिस्वास 'सारस' पत्रिका के प्रवेशां...Read More

'एक और अंतरीप' (अप्रैल-जून, 2017): अंक समीक्षा- भगवानदास मोरवाल

by 3:09:00 am
जो समझते हैं कि मैं, दुनिया के लायक हूँ नहीं l वे कहेंगे बाद में, दुनिया मेरे काबिल नहीं ll  (हेतु भारद्वाज) इन दिनों जिस तरह...Read More

जनकृति अंतरराष्ट्रीय पत्रिका के 'संपादक एवं संपादकीय विशेषांक' हेतु सूचना

by 2:49:00 am
#संपादक_संपादकीय_विशेषांक 2017 आप सभी को सूचित किया जाता है कि जनकृति अंतरराष्ट्रीय पत्रिका का आगामी विशेषांक पत्रिकाओं के संपादकों, संप...Read More

‘सारस’ पत्रिका के प्रवेशांक ‘साहित्य में किसान' पर केंद्रित. अंक हेतु (रचनाएँ एवं लेख आमंत्रित)

by 2:26:00 am
इस विषय के तहत भारतीय समाज में किसानों की स्थिति तथा भारतीय अर्थव्यवस्था में किसानों की भूमिका को खत्म करने के प्रयास से संबंधित समस्या...Read More

प्रदीप नील जी का हरियाणवी उपन्यास "जाट कहवै, सुण जाटणी"

by 2:22:00 am
अपना पहला हरियाणवी उपन्यास "जाट कहवै, सुण जाटणी" आपके सामने रख रहा हूं, खरीदने का आग्रह बिल्कुल नहीं करूंगा। हां, गारंटी जरूर ...Read More

उन्नीसवीं सदी का भारतीय पुनर्जागरण : यथार्थ या मिथक- नामवर सिंह

by 2:41:00 am
( एक) पिछले पच्चीस-तीस वर्षों से मैं इस पर सोचता रहा हूं और इस विषय पर कुछ खंड लिख भी चुका हूं. 19 वीं सदी के गुजराती साहित्य में औ...Read More
बिना अनुमति के सामग्री का उपयोग न करें. . enjoynz के थीम चित्र. Blogger द्वारा संचालित.